ग़ज़ल डॉ डी. एम. मिश्र February 06, 2016

समंदर की लहर पहचानता हूँ क्‍या करूँ लेकिन
हवा का रूख बदलना चाहता हूँ क्या करूँ लेकिन
मुझे मालूम है जाना किधर है किस दिशा में, पर
मैं कश्‍ती की दशा भी देखता हूँ क्‍या करूँ लेकिन
जवानी थी कमाता था तो देता था तुम्‍हें बेटा
बुढापा आ गया तो माँगता हूँ क्‍या करूँ लेकिन
हुआ जो जुल्‍म मजलूमों पे उसको जानता हूँ मैं
कहाँ खामोश रहना चाहता हूँ क्‍या करूँ लेकिन
मुझे मालूम है किसने लगाई आग पानी में
धुआँ जो उठ रहा है देखता हूँ क्‍या करूँ लेकिन
जिधर भी देखता हूँ रास्‍ता सब बंद पाता हूँ
तेरे कूचे से जाना चाहता हूँ क्‍या करूँ लेकिन
— डॉ डी एम मिश्र