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अपनी माटी
वर्ष-2, अंक-21 (जनवरी, 2016)
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ग़ज़ल: डॉ. डी.एम. मिश्र

1.
चित्रांकन-सुप्रिय शर्मा

गाँवों का उत्थान देखकर आया हूँ
मुखिया की दालान देखकर आया हूँ

मनरेगा की कहाँ मजूरी चली गई
सुखिया को हैरान देखकर आया हूँ

कागज़ पर पूरा पानी है नहरों में
सूख गया जो धान देखकर आया हूँ

कल तक टूटी छान न थी अब पक्का है
नया-नया प्रधान देखकर आया हूँ

लछमिनिया थी चुनी गयी परधान मगर
उसका ‘पती-प्रधान’ देखकर आया हूँ

बंगले के अन्दर में जाने क्या होगा
अभी तो केवल लॉन देखकर आया हूँ

रोज सदन में गाँव पे चर्चा होती है
‘मेरा देश महान’ देखकर आया हूँ
2.
नम मिट्टी पत्थर हो जाये ऐसा कभी न हो
मेरा गाँव, शहर हो जाये ऐसा कभी न हो।

हर इंसान में थोड़ी बहुत तो कमियाँ होती है
वो बिल्कुल ईश्वर हो जाये ऐसा कभी न हो।

बेटा, बाप से आगे हो तो अच्छा लगता है
बाप के वो ऊपर हो जाये ऐसा कभी न हो।

मेरे घर की छत नीची हो मुझे गवारा है
नीचा मेरा सर हो जाये ऐसा कभी न हो।

खेत मेरा परती रह जाये कोई बात नहीं
खेत मेरा बंजर हो जाये ऐसा कभी न हो।

गाँव में जब तक सरपत है बेघर नहीं है कोई
सरपत सँगमरमर हो जाये ऐसा कभी न हो।

डॉ. डी.एम. मिश्र
604, सिविल लाइन, निकट राणा प्रताप पी.जी. कालेज,सुलतानपुर-228001
मो0 9415074318,ई-मेल:dmmishra28@gmail.com