गज़ल..
गजल / डॉ डी एम मिश्र -
मुहब्बत टूट कर करता हूॅ -
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मुहब्बत टूट कर करता हूॅ पर अंधा नहीं बनता
खुदा से भी मै अपने प्यार एकतरफा नही करता
मुहब्बत टूट कर करता हूॅ -
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मुहब्बत टूट कर करता हूॅ पर अंधा नहीं बनता
खुदा से भी मै अपने प्यार एकतरफा नही करता
चलो अच्छा हुआ जो झूठ पर से उठ गया परदा
वो मेरा हो नहीें सकता , मैं उसका हो नहीं सकता
वो मेरा हो नहीें सकता , मैं उसका हो नहीं सकता
हजारों साल की सब दुश्मनी मैं भूल जाता हूॅ
गले लगता हूॅ तो दिल में कोई दूरी नहीें रखता
गले लगता हूॅ तो दिल में कोई दूरी नहीें रखता
भले सैयाद है फिर भी कहीें उसके भी दिल होगा
उसे भी कील चुभती है किसी का पंख जब कटता
उसे भी कील चुभती है किसी का पंख जब कटता
मेरे कातिल तलक कोई मेरा पैगाम पहुॅचा दे
लहू ऑखों से जब टपके तो फिर ऑसू नहीं बहता
लहू ऑखों से जब टपके तो फिर ऑसू नहीं बहता
दिखे नन्हीं -सी चिन्गारी घरों में आग लग जाती
उसे मालूम होगा क्यों चिरागों से धुऑ उठता
उसे मालूम होगा क्यों चिरागों से धुऑ उठता
