गजल
गजल
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रक्त का संचार है पर्यावरण
साँस की रफ़्तार है पर्यावरण।
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रक्त का संचार है पर्यावरण
साँस की रफ़्तार है पर्यावरण।
फूल , फल या छाँव की ख्वाहिश अगर
तो प्रकृति का प्यार है पर्यावरण।
तो प्रकृति का प्यार है पर्यावरण।
उन परिन्दों के लिए भी सोचिए
उनकी भी दरकार है पर्यावरण।
उनकी भी दरकार है पर्यावरण।
मन खिले, आँगन खिले, उपवन खिले
फिर है क्या तैयार है पर्यावरण ।
फिर है क्या तैयार है पर्यावरण ।
जन्म से लेकर मरण तक साथ दे
जिंदगी का सार है पर्यावरण।
जिंदगी का सार है पर्यावरण।
पेड़ रोया , पर कुल्हाड़ा देखकर
किस क़दर लाचार है पर्यावरण।
किस क़दर लाचार है पर्यावरण।
एक पौधा आप भी आकर लगायें
प्रकृति का श्रृंगार है पर्यावरण ।
प्रकृति का श्रृंगार है पर्यावरण ।
Dr DM Mishra
सरस्वती वंदना 2
सरस्वती वंदना
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मइया तोहरे दुआरे भईं भीर पसारौ जग्य आपनि हो ।
बडे-बडे तोहरे सपूत उतारैं तोहरी आरती हो
चहुॅदिशि जस कै पताका फहराय मइया भारती हो
मइया तोहरी किरति कै बखान करत न अघाय जिहवा
सरवस तुॅह पै लुटाय कै फूला न समाय मनवा
मइया गुन ढॅग हमरे न एक उबारौ जग्य आपनि हो ।
विधि कै दुलारी कल्यानी मइया घट-घट वासिनी हो
हम पै तोहार उपकार बडा स्वर- सुर दायिनी हो
नाम लै तोहार मिटै कलुष हमार हॅसवाहिनी हो
खुलै ज्ञान और बुद्धि कै कपाट वीणावादिनी हो ।
भूल हमसे न कउनो होइ जाय सॅभारौ जग्य आपनि हो ।
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मइया तोहरे दुआरे भईं भीर पसारौ जग्य आपनि हो ।
बडे-बडे तोहरे सपूत उतारैं तोहरी आरती हो
चहुॅदिशि जस कै पताका फहराय मइया भारती हो
मइया तोहरी किरति कै बखान करत न अघाय जिहवा
सरवस तुॅह पै लुटाय कै फूला न समाय मनवा
मइया गुन ढॅग हमरे न एक उबारौ जग्य आपनि हो ।
विधि कै दुलारी कल्यानी मइया घट-घट वासिनी हो
हम पै तोहार उपकार बडा स्वर- सुर दायिनी हो
नाम लै तोहार मिटै कलुष हमार हॅसवाहिनी हो
खुलै ज्ञान और बुद्धि कै कपाट वीणावादिनी हो ।
भूल हमसे न कउनो होइ जाय सॅभारौ जग्य आपनि हो ।
सरस्वती वंदना 1
दे मुझे वरदान मॉ
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शीश पर रख हाथ मेरे दे मुझे वरदान मॉ
ज्ञान दे इतना कि तेरा कर सकूॅ गुणगान मॉ।
वो विधाता है किसी भी जीव को देता है शक्ल
किन्तु, तू तो मॉ है जो इन्सान में भरती है अक्ल
अक्षरों की सीढियॉ कैसे बना लेते हैं लोग
चॉद को , मंगल को भी छूकर दिखा देते हैं लोग ।
बुद्धि और विवेक दे , मैं भी बनूॅ इन्सान मॉ ।
सूर , तुलसी , जायसी किसको बना दे तू कबीर
मीर, गालिब , जौक , मोमिन कौन बन जाये नजीर
मॉ तेरा जो हो गया वो नामवाला हो गया
दाग कोई हो गया कोई निराला हो गया ।
ले मुझे भी शरण में , मैं भी बनूॅ रसखान मॉ ।
सरस्वती तू ही है मॉ, तू ही है वीणापाणिनी
शारदे, वागीश्वरी, तू ही है मॉ वरदायिनी
कौन कब 'रघुवंश' लिख दे , कौन इसको जानता
बाल्मीकी कौन, कब बन जाय ये किसको पता ।
दे मुझे भी लेखनी , मुझ पर भी कर एहसान मॉ ।
गजल : होली में
आ धमके साले- बहनोई होली में
बजट कर गया साफ रसोई होली में। - बच्चों की मॉ की फरमाइश थमी नहीें मैंने भी पीकर सुध खेार्इ होली में ।
वो ख़ुमार , वोे नशा चढ़ा इस फागुन में
लगता नहीं पराया कोई होली में ।
वो गूलाल , वो रंग उड़ा पिचकारी से
जगी कामना थी जो सोई होली में ।
दीवाने पड़ गये हैं लँहगा के पीछे
चूनर- चोली खूब भिगोई होली में।
हम तो जनम-जनम के रसिक हमारा क्या
संतों ने भी कंठी खेाई होली में ।
मदन राग से सारा उपवन गूॅज उठा
तू भी छेड़ कबीरा कोई होली में ।
मगर सलहजें वादा करके चली गयीं
फिर आयेंगे हम ननदोई होली में ।
---- डॉ डी एम मिश्र
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गजल : तब होली है
गजल : तब होली है
डॉ डी. एम. मिश्र
जरै बुराई एक-एक कर तब होली है
भरै सभी का पेट बराबर तब होली है।
तरस रहे कितने बच्चे उनकी भी सोचो
चढ़ै कढ़ाई यारो घर-घर तब होली है।
धरती तो यह रंग-बिरंगी हो जायेगी
रँग जाये, पर सारा अंबर, तब होली है ।
एक रंग में सब रँग जायें कुछ ऐसा हो
बढ़े प्रेम औ’ रहे न अंतर तब होली है ।
अपने घर में बंद रहें तो कैसी होली
एक-दूसरे के जायें घर तब होली है ।
जिसका मकसद समता का है पाठ पढ़ाना
उस होली का हो न निरादर तब होली है।
— डॉ डी एम मिश्र
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साहित्यिक समाचार - --------------------------- साहित्यिक संस्था * सृजन -पीठ* , जिसका मैं संयोजक भी हूॅ के तत्वावधान में वरिष्ठ साहित्यकार कमलनयन पाण्डेय की पुस्तक -*सृजन में संदेश और व्यंग्य * का विमोचन हमारे बुजुर्ग मशहूर शायर अजमल सुलतानपुरी की अध्यक्षता मे हुआ । विद्वान प्रो डाॅ राध्ेाश्याम सिंह , डाॅ धर्मपाल सिेह, डॉ सुशील कुमार पाण्डेय * साहित्येन्दु, डॉजे पी सिंह , डाॅ मित्र भद्रसिेह, इन्द्र मणि कुमार , राज खन्ना आदि ने अपने विचार रखे । संगोष्ठी का संचालन पैर मे फ्रैकच्ार के कारण मुझे बैठकर करना पडा ।




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अपनी माटी
वर्ष-2, अंक-21 (जनवरी, 2016)
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ग़ज़ल: डॉ. डी.एम. मिश्र
1.
गाँवों का उत्थान देखकर आया हूँ
मुखिया की दालान देखकर आया हूँ
मनरेगा की कहाँ मजूरी चली गई
सुखिया को हैरान देखकर आया हूँ
कागज़ पर पूरा पानी है नहरों में
सूख गया जो धान देखकर आया हूँ
कल तक टूटी छान न थी अब पक्का है
नया-नया प्रधान देखकर आया हूँ
लछमिनिया थी चुनी गयी परधान मगर
उसका ‘पती-प्रधान’ देखकर आया हूँ
बंगले के अन्दर में जाने क्या होगा
अभी तो केवल लॉन देखकर आया हूँ
रोज सदन में गाँव पे चर्चा होती है
‘मेरा देश महान’ देखकर आया हूँ
1.
![]() |
| चित्रांकन-सुप्रिय शर्मा |
गाँवों का उत्थान देखकर आया हूँ
मुखिया की दालान देखकर आया हूँ
मनरेगा की कहाँ मजूरी चली गई
सुखिया को हैरान देखकर आया हूँ
कागज़ पर पूरा पानी है नहरों में
सूख गया जो धान देखकर आया हूँ
कल तक टूटी छान न थी अब पक्का है
नया-नया प्रधान देखकर आया हूँ
लछमिनिया थी चुनी गयी परधान मगर
उसका ‘पती-प्रधान’ देखकर आया हूँ
बंगले के अन्दर में जाने क्या होगा
अभी तो केवल लॉन देखकर आया हूँ
रोज सदन में गाँव पे चर्चा होती है
‘मेरा देश महान’ देखकर आया हूँ
2.
नम मिट्टी पत्थर हो जाये ऐसा कभी न होमेरा गाँव, शहर हो जाये ऐसा कभी न हो।
हर इंसान में थोड़ी बहुत तो कमियाँ होती है
वो बिल्कुल ईश्वर हो जाये ऐसा कभी न हो।
बेटा, बाप से आगे हो तो अच्छा लगता है
बाप के वो ऊपर हो जाये ऐसा कभी न हो।
मेरे घर की छत नीची हो मुझे गवारा है
नीचा मेरा सर हो जाये ऐसा कभी न हो।
खेत मेरा परती रह जाये कोई बात नहीं
खेत मेरा बंजर हो जाये ऐसा कभी न हो।
गाँव में जब तक सरपत है बेघर नहीं है कोई
सरपत सँगमरमर हो जाये ऐसा कभी न हो।
डॉ. डी.एम. मिश्र
604, सिविल लाइन, निकट राणा प्रताप पी.जी. कालेज,सुलतानपुर-228001
मो0 9415074318,ई-मेल:dmmishra28@gmail.com
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