गजल : तब होली है
डॉ डी. एम. मिश्र
जरै बुराई एक-एक कर तब होली है
भरै सभी का पेट बराबर तब होली है।
तरस रहे कितने बच्चे उनकी भी सोचो
चढ़ै कढ़ाई यारो घर-घर तब होली है।
धरती तो यह रंग-बिरंगी हो जायेगी
रँग जाये, पर सारा अंबर, तब होली है ।
एक रंग में सब रँग जायें कुछ ऐसा हो
बढ़े प्रेम औ’ रहे न अंतर तब होली है ।
अपने घर में बंद रहें तो कैसी होली
एक-दूसरे के जायें घर तब होली है ।
जिसका मकसद समता का है पाठ पढ़ाना
उस होली का हो न निरादर तब होली है।
— डॉ डी एम मिश्र
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