वो पता ढूॅढें का बर्ल्व / फ्लैप
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हिंदी ग़ज़ल इन दिनों
अपने रचनात्मक द्वंद्व से गुजर रही है। इसमें एक ओर उर्दू ग़ज़ल की नाजुकी को बनाए
रखने की चुनौती है तो दूसरी तरफ दुष्यंत, शलभ और अदम जैसे हिंदी कवियों की यथार्थवादी और समाजोन्मुख
काव्य-परंपरा के विकास का दायित्व। इस परंपरा को और पीछे जाकर देखना हो तो निराला, शमशेर और त्रिलोचन आदि की ग़ज़लों में देखा जा सकता है। कहना
चाहिए कि समकालीन हिंदी ग़ज़ल अपनी इस काव्य-संस्कृति को निरंतर विकसित कर रही है; और सुपरिचित ग़ज़लकार डी एम मिश्र इसी संस्कृति के वाहक हैं।
‘वो पता ढूँढें हमारा’ मिश्र जी का चौथा ग़ज़ल-संग्रह है। 2016 में उनका तीसरा
ग़ज़ल-संग्रह ‘आईना-दर-आईना’ आया था। उस पर टिप्पणी करते हुए कथाकार संजीव ने कहा था-‘‘श्री मिश्र बुनियादी रूप से परिवर्तन और आक्रोश के शायर हैं’’, और उनकी ग़ज़लें उर्दू ग़ज़ल की रवायती बंदिशों को हू-ब-हू नहीं
निभातीं, ताकि इससे उनकी बात का वज़न भी बना रहे और बनक का सौंदर्य भी।
यह इसलिए भी कि ‘‘उनकी
ग़ज़ल का वजूद जनता के चलते है, न
कि शुद्धतावादी आलोचकों के चलते।’’ संजीव
जी के इस कथन को मिश्र जी के एक शेर के सहारे कहूँ तो ‘‘हमारी अदा साफ़गोई हमारी/ग़ज़ल भी इशारों में कहते नहीं हैं।’’
फिर भी अपनी जन-प्रतिबद्धता और प्रतिरोधी
चेतना को खुलकर व्यक्त करते हुए भी उनके यहाँ ज़रूरी सांकेतिकता की कमी नहीं है।
उदाहरण के लिए उनका यह शेर-
किसी सरकार के हाथों
में ताक़त की कमी थी क्या
मगर चोरों, लुटेरों के कलेजे में कहाँ दम था।
सरसरी तौर से देखें तो इसके व्यंजनार्थ तक
सहज ही नहीं पहुँचा जा सकता। इसके लिए सत्ता-व्यवस्था के बुनियादी चरित्र की समझ
जरूरी है। सरकार के हाथों में ताक़त की कमी नहीं, लेकिन उसके कलेजे में दम नहीं है -माने इच्छा-शक्ति का दम; वह क्यों नहीं है, क्योंकि सरकार स्वयं ही चोर और लुटेरी है! यानी सत्ता के पास
देहबल नहीं, आत्मबल होना चाहिए।
डी एम मिश्र की ग़ज़लों का यह तेवर
जन-प्रतिबद्ध ग़ज़लकारों की उसी काव्य-परंपरा को विकसित करता है, जिसे प्रगतिशील और जनवादी कहा जाता है। शोषित, पीड़ित और वंचित समाज की बहुविध त्रासदियों, विडंबनाओं और उसकी अनथक संघर्ष-चेतना के अनेक बिंब उनके शेरों
से उभरते हैं। शोषकों की नज़र के ख़ंजरों और लबों के शोलों की भी उन्हें खासी पहचान
है। पाठकों के लिए उनके अनेक शेर अपनी शेरियत में रुचिकर भी हैं और प्रेरणाप्रद
भी। बानगी के लिए ये शेर-
अशुभ लकीरें माथे
पर हों उनसे कोई ख़ौफ नहीं
मगर दिलों के बीच खिंचे जो उस लकीर से
डरता हूँ
आँसुओं की इस नदी
में मोतियों का थाल लेकर
रोशनी की झालरों में कौन है जो टिमटिमाता
मेरी सुबहों मेरी
शामों पे बुलडोजर चला देगा
वो जालिम है तो क्या यादों पे बुलडोजर चला देगा
खुदा गर चाहता
है हर बशर दौड़ा चला आए
तो
मेरी भी यही ज़िद है कि मेरे घर खुदा आए
वो पता ढूँढें
हमारा पैन में आधार में
ऐ खुदा, हम तो ग़ज़ल के चंद अशआरों में हैं
मेरा दिल तब और
धड़कने लगता है
मेरा क़ातिल रहम करे जब दया करे
ज़ाहिर है, डी एम मिश्र की ग़ज़लों में यही शेर नहीं हैं जो उनकी समझ, सरोकार, सौंदर्य-दृष्टि
और रचनात्मक कौशल के परिचायक हैं। उनके यहाँ उस मिट्टी की भी कमी नहीं, जिसे हमारा किसान-मजदूर अपने पसीने से सींचता है। इसीलिए
उन्हें ‘खेतों की हरियाली’ के साथ ‘बच्चों
की थाली’ जुड़ी नज़र आती है।
अनायास नहीं कि मिश्र जी की भाषायी
संस्कृति भी उस विवाद से परे है, जिसके
चलते कुछ लोग ग़ज़ल की गंगा-जमनी तहज़ीब को नकारते हैं। ऐसे शुद्धतावादी आग्रहों से
मिश्र जी पूर्णतः मुक्त हैं। उन्हें न हिंदी से गिला है, न उर्दू से शिकायत, क्योंकि वे ‘आँसुओं
के हर्फ पढ़ना जानते हैं। इसके बावजूद उन्हें आँसुओं के हर्फ ही काम्य नहीं हैं, बल्कि वे उनके हक़ तक जाते हैं। उनकी संवेदना की भी एक वेदना है, तर्क है। मात्र भावोच्छवास नहीं है वह -‘‘सहारा था उन्हें बनना सहारा ढूँढते हैं वो/कहीं का भी नहीं
रखती जवाँ बच्चों को बेकारी।’’ यहाँ
यह ‘बेकारी’ शब्द
ही हमें सत्ता-व्यवस्था के प्रतीकार्थ तक ले जाता है। ज़ाहिर है, ऐसे भाषायी प्रयोग बिना वैज्ञानिक दृष्टि के संभव नहीं हो
सकते। डी एम मिश्र के यहाँ यह दृष्टि निरंतर सक्रिय दिखाई देती है। इसीलिए इनका यह
कथन भी गौर करने लायक है-
शब्दों की धार को कभी
मरने नहीं दिया
ग़ज़लें हमारी और हैं
नग़मे हमारे और।
-रामकुमार कृषक