गजल : होली में

आ धमके साले- बहनोई होली में बजट कर गया साफ रसोई होली में। - बच्‍चों की मॉ की फरमाइश थमी नहीें मैंने भी पीकर सुध खेार्इ होली में । वो ख़ुमार , वोे नशा चढ़ा इस फागुन में लगता नहीं पराया कोई होली में । वो गूलाल , वो रंग उड़ा पिचकारी से जगी कामना थी जो सोई होली में । दीवाने पड़ गये हैं लँहगा के पीछे चूनर- चोली खूब भिगोई होली में। हम तो जनम-जनम के रसिक हमारा क्या संतों ने भी कंठी खेाई होली में । मदन राग से सारा उपवन गूॅज उठा तू भी छेड़ कबीरा कोई होली में । मगर सलहजें वादा करके चली गयीं फिर आयेंगे हम ननदोई होली में । ---- डॉ डी एम मिश्र ..

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गजल : तब होली है

गजल : तब होली है डॉ डी. एम. मिश्र जरै बुराई एक-एक कर तब होली है भरै सभी का पेट बराबर तब होली है। तरस रहे कितने बच्चे उनकी भी सोचो चढ़ै कढ़ाई यारो घर-घर तब होली है। धरती तो यह रंग-बिरंगी हो जायेगी रँग जाये, पर सारा अंबर, तब होली है । एक रंग में सब रँग जायें कुछ ऐसा हो बढ़े प्रेम औ’ रहे न अंतर तब होली है । अपने घर में बंद रहें तो कैसी होली एक-दूसरे के जायें घर तब होली है । जिसका मकसद समता का है पाठ पढ़ाना उस होली का हो न निरादर तब होली है। — डॉ डी एम मिश्र

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