चर्चित पत्रिका * कृति ओर * के ताजे अंक -85 :: जुलाई -सितम्बर 2017 मे प्रकाशित दो ग़ज़लें ....

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..1.
फ़ितरतों से दूर उसकी मुफ़लिसी अच्छी लगी
उसका घर अच्छा लगा, उसकी गली अच्छी लगी।
वो पुजारी है बजाये शंख उसकी बात और
हाथ छोटे हैं हमारे बाँसुरी अच्छी लगी।
ना कहीं कुंडी लगी है, ना कहीं ताला जड़ा
इन परिन्दों को हमारी कोठरी अच्छी लगी।
एक दुश्मन त्यागकर वर्षों पुरानी दुश्मनी
फिर गले आकर लगा तो दोस्ती अच्छी लगी।
फिर नदी के पास जायें, फिर कुआँ खोदें कोई
इसलिए प्यासे लबों की तश्नगी अच्छी लगी।
इन पतंगो का जुनूँ भी क़ाबिले तारीफ़ है
चार पल की ज़िंदगी हिम्मत भरी अच्छी लगी।
2
अँधेरा जब मुक़द्दर बन के घर में बैठ जाता है
मेरे कमरे का रोशनदान तब भी जगमगाता है।
किया जो फ़ैसला मुंसिफ़ ने वो बिल्कुल सही लेकिन
ख़ुदा का फ़ैसला हर फ़ैसले के बाद आता है।
अगर मर्ज़ी न हो उसकी तो कुछ हासिल नहीं होता
किनारे पर लगे कश्ती तो साहिल डूब जाता है।
खिलौने का मुक़द्दर है यही तो क्या करे कोई
नहीं खेलें तो सड़ जाये, जो खेलें टूट जाता है।
ख़ुदा ने जो बनाया है ज़रूरी ही बनाया है
कभी ज़र्रा, कभी पर्वत हमारे काम आता है।
यही विश्वास लेकर घर से अपने मैं निकल आया
अँधेरे जंगलों में रास्ता जुगनू दिखाता है।