दे मुझे वरदान मॉ
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शीश पर रख हाथ मेरे दे मुझे वरदान मॉ
ज्ञान दे इतना कि तेरा कर सकूॅ गुणगान मॉ।
वो विधाता है किसी भी जीव को देता है शक्ल
किन्तु, तू तो मॉ है जो इन्सान में भरती है अक्ल
अक्षरों की सीढियॉ कैसे बना लेते हैं लोग
चॉद को , मंगल को भी छूकर दिखा देते हैं लोग ।
बुद्धि और विवेक दे , मैं भी बनूॅ इन्सान मॉ ।
सूर , तुलसी , जायसी किसको बना दे तू कबीर
मीर, गालिब , जौक , मोमिन कौन बन जाये नजीर
मॉ तेरा जो हो गया वो नामवाला हो गया
दाग कोई हो गया कोई निराला हो गया ।
ले मुझे भी शरण में , मैं भी बनूॅ रसखान मॉ ।
सरस्वती तू ही है मॉ, तू ही है वीणापाणिनी
शारदे, वागीश्वरी, तू ही है मॉ वरदायिनी
कौन कब 'रघुवंश' लिख दे , कौन इसको जानता
बाल्मीकी कौन, कब बन जाय ये किसको पता ।
दे मुझे भी लेखनी , मुझ पर भी कर एहसान मॉ ।